जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, आम आदमी पार्टी ने फिर से पुराने दावों और दिखावटी दौरों का सहारा लेना शुरू कर दिया है। हाल ही में पार्टी के एक प्रमुख नेता ने अपने निर्वाचन क्षेत्र के एक मंदिर का दौरा किया और दावा किया कि वे हर तीसरे या चौथे दिन इस क्षेत्र का दौरा करते हैं। लेकिन पास की वाल्मीकि बस्ती के निवासियों ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया। एक निवासी, जो यहां पिछले कई दशकों से रह रहे हैं, ने नाराजगी जताते हुए कहा, “हमने उन्हें पिछले पांच सालों में यहां नहीं देखा।”
यह वही बस्ती है, जहां से 2013 में आम आदमी पार्टी ने अपने प्रतीक ‘झाड़ू’ का इस्तेमाल करते हुए भ्रष्टाचार मिटाने और ईमानदारी की राजनीति का नारा दिया था। लेकिन आज यह बस्ती न केवल उपेक्षा का शिकार है, बल्कि पार्टी की कथनी और करनी में भारी अंतर का गवाह भी बन गई है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो पार्टी खुद को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का चेहरा बताती थी, उस पर अब भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप क्यों लग रहे हैं? पार्टी के कई नेताओं पर आर्थिक अनियमितताओं, फंड के दुरुपयोग, और सरकारी योजनाओं में घोटालों के आरोप लगे हैं। यहां तक कि जिन संस्थानों को जनता की भलाई के लिए स्थापित किया गया था, वे भी भ्रष्टाचार का अड्डा बन गए। क्या यही वह ‘स्वच्छ राजनीति’ है, जिसका वादा आम आदमी पार्टी ने जनता से किया था?
दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्रों, जो कभी पार्टी के प्रदर्शन के मॉडल माने जाते थे, अब भ्रष्टाचार और घोटालों के मामलों से घिरे हुए हैं। सरकारी स्कूलों और अस्पतालों के निर्माण में लागत बढ़ाकर करोड़ों रुपये का गबन किया गया, जबकि जमीनी हकीकत में सुधार न के बराबर हुआ। शराब नीति घोटाले के आरोपों ने पार्टी की साख को और अधिक गिरा दिया, जिससे यह सवाल खड़ा होता है कि क्या पार्टी वाकई में पारदर्शिता और ईमानदारी की राजनीति कर रही है या सिर्फ दिखावे की?
वाल्मीकि बस्ती के निवासियों का कहना है कि पांच साल में न तो विकास हुआ और न ही उनकी समस्याओं को सुना गया। भ्रष्टाचार के आरोप और बस्ती की दुर्दशा को देखते हुए, यह कहना मुश्किल है कि आम आदमी पार्टी ने अपने वादों पर कितना खरा उतरा।
आम आदमी पार्टी, जो कभी ईमानदारी और जनता की भलाई की राजनीति का प्रतीक थी, आज उसी भ्रष्टाचार का हिस्सा बनती दिख रही है, जिसके खिलाफ उसने लड़ने का वादा किया था। सवाल यह है: क्या जनता एक ऐसी पार्टी पर दोबारा भरोसा कर सकती है, जिसने न केवल उनके भरोसे को तोड़ा, बल्कि खुद को उन्हीं घोटालों और अनियमितताओं में घसीट लिया, जिनके खिलाफ वह लड़ने का दावा करती थी?
वाल्मीकि बस्ती के लोगों ने अपना संदेश स्पष्ट कर दिया है। अब समय आ गया है कि जनता केवल नारों और विज्ञापनों पर नहीं, बल्कि सच्चाई, पारदर्शिता, और काम के आधार पर फैसला करे। यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और अधिकारों का हिसाब लेने का समय है।





















