राज्य ब्यूरो, पटना। एक देश-एक चुनाव (One Nation One Election) के मुद्दे पर बिहार की राजनीति स्पष्ट तौर पर दो फांक है। इसके समर्थन में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के घटक दलों के साथ नवगठित जन सुराज पार्टी (जसुपा) भी है। दूसरी ओर महागठबंधन है, जिसे यह विचार कतई स्वीकार्य नहीं। इसके सबसे बड़े घटक राजद द्वारा जगह-जगह पोस्टर लगाकर इसी के समानांतर समान शिक्षा और चिकित्सा व्यवस्था आदि का मुद्दा उछाला जा रहा है।
अंदरखाने चर्चा है कि क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व के लिए यह व्यवस्था घातक सिद्ध होगी। यह बात दीगर कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव के मुद्दे अलग-अलग होते हैं, लेकिन एक साथ चुनाव होने पर मुद्दों के गड्मगड्ड होने और चुनाव परिणाम पर उसके प्रभाव की आशंका है।
‘सरकार का खर्च बढ़ता है’
उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का कहना है कि जिस कांग्रेस को 1952 से 1967 तक एक साथ चुनाव के जरिये केंद्र और राज्यों की सत्ता में रहने पर कोई आपत्ति नहीं थी, वह आज विरोध में खड़ी है। आए दिन चुनाव से विकास के काम बाधित होते हैं और सुरक्षा बलों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। सरकार का खर्च बढ़ता है।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. दिलीप जायसवाल मान रहे हैं कि इस व्यवस्था से राजनीतिक अस्थिरता को समाप्त किया जा सकता है। चुनाव प्रक्रिया में खर्च होने वाले धन और समय का सदुपयोग राष्ट्र निर्माण के कार्यों में किया जा सकता है। जसुपा के सूत्रधार प्रशांत किशोर की भी यही राय है, बशर्ते कि इस व्यवस्था के पीछे केंद्र की मंशा सही हो।
‘ध्यान भटकाने का हथकंडा’
विपक्ष का भय वस्तुत: इस मंशा को लेकर ही है। कांग्रेस इसे महंगाई-बेरोजगारी-असहिष्णुता जैसे जरूरी मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने का हथकंडा बता रही तो राजद की राय में इस व्यवस्था से संवैधानिक खतरे की आशंका बढ़ेगी।






















