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अडिग प्रतिरोध: कैसे अहोम राज्य ने मुग़ल साम्राज्य को हराया और अपनी संप्रभुता को बचाए रखा

भारतीय इतिहास में अहोम राज्य की भूमिका अक्सर उपेक्षित रही है, खासकर जब बात मुग़ल साम्राज्य की आती है। इस राज्य ने छह शताब्दियों (1228-1826) तक न केवल अपनी स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखा, बल्कि मुग़ल साम्राज्य के विशाल सैन्य बल का भी सफलतापूर्वक प्रतिकार किया। अहोमों ने अपने अद्वितीय रणनीति, भौगोलिक ज्ञान और दृढ़ संकल्प के साथ मुग़ल आक्रमणों का मुकाबला किया, लेकिन अफसोस की बात है कि इतिहासकारों ने उनकी वीरता और साहस को दरकिनार कर दिया और मुग़ल साम्राज्य को बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया। यह लेख इस असमान और चयनात्मक इतिहास लेखन पर गंभीर सवाल उठाता है।

अहोम साम्राज्य ने मुग़ल साम्राज्य से न केवल सैन्य संघर्ष किया, बल्कि भौगोलिक लाभ का पूरा उपयोग किया। असम का घना जंगल, पहाड़ी क्षेत्र और बहेती नदियाँ अहोमों के लिए एक प्राकृतिक किला बन गई थीं। अहोमों ने इन प्राकृतिक संसाधनों का रणनीतिक रूप से उपयोग किया, न कि सीधे युद्ध में मुग़ल सेनाओं का सामना करने के बजाय, वे छापामार युद्ध और गेरिल्ला युद्ध का सहारा लेते थे। यही कारण था कि मुग़ल सैनिकों की भारी संख्या और विशाल सेना के बावजूद अहोमों ने अपने साम्राज्य को बचाए रखा।

इस महान प्रतिरोध के केंद्र में थे लछित बोर्पुकन, अहोम साम्राज्य के महान सेनापति, जिनकी वीरता और नेतृत्व का उदाहरण साराइघाट की लड़ाई (1671) में देखा गया। जब मुग़ल सम्राट और उनके सेनापति राजा रामसिंह ने असम पर कब्जा करने के लिए विशाल सेना और नौसैनिक बल भेजे, तो लछित बोर्पुकन ने उन्हें अपनी अद्वितीय रणनीति से मात दी। लछित ने ब्रह्मपुत्र नदी में एक पूरी नई युद्ध शैली का परिचय दिया, जहां अहोम सेना ने अपनी छोटी, तेज़ नावों से मुग़ल जलसेना को पछाड़ दिया। यह लड़ाई अहोमों के लिए एक ऐतिहासिक विजय थी, और यह साबित करती है कि अगर नेतृत्व सही हो, तो संख्याएँ और संसाधन कोई मायने नहीं रखते।

लछित बोर्पुकन की नेतृत्व क्षमता, उनके साहस और त्याग को इतिहास में उचित स्थान नहीं मिला है। वह लड़ाई के दौरान बहुत बीमार थे, फिर भी उन्होंने अपनी सेना का नेतृत्व किया और यह कहा, “मेरी कर्तव्य से बढ़कर कुछ नहीं है, यहां तक कि जीवन भी नहीं”, जो उनके अद्वितीय समर्पण और बलिदान को दर्शाता है। इसके बावजूद, भारतीय इतिहास की मुख्यधारा में इस असाधारण व्यक्ति का योगदान अजनबी ही रहा है।

यहां एक और बड़ा सवाल उठता है, वह यह है कि क्यों भारतीय इतिहास के लेखकों ने अहोमों की इस वीरता को अनदेखा किया। अधिकांश इतिहासकारों ने मुग़ल साम्राज्य को एक महान और महानायक रूप में चित्रित किया, जबकि उन्होंने अहोमों के संघर्ष और उनकी रणनीतिक सफलताओं को पूरी तरह से नजरअंदाज किया। मुग़ल साम्राज्य की विशालता और विजय को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया, जबकि अहोमों की ऐतिहासिक भूमिका को मामूली या उपेक्षित किया गया। यह चयनात्मक इतिहास लेखन यह दिखाता है कि कुछ कथाएँ और घटनाएँ जानबूझकर इतिहास से बाहर कर दी जाती हैं, जो कि हमारे ऐतिहासिक समझ को विकृत करता है।

मुग़ल साम्राज्य के प्रति यह चयनात्मक दृष्टिकोण हमें यह समझने से रोकता है कि भारत में कितनी अन्य महान संस्कृतियाँ और साम्राज्य थे, जिन्होंने मुग़ल साम्राज्य का सामना किया और अपनी संप्रभुता बनाए रखी। अहोम राज्य के प्रतिरोध की कहानी हमें यह सिखाती है कि शक्ति और सैन्य बल से भी अधिक महत्वपूर्ण रणनीति, एकता और दृढ़ संकल्प होता है। अहोमों ने यह साबित किया कि किसी भी साम्राज्य को तोड़ने के लिए सिर्फ सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि सोच-समझ और योजना की आवश्यकता होती है।

इसके अलावा, अहोम साम्राज्य की जीत केवल एक सैन्य विजय नहीं थी, बल्कि यह सांस्कृतिक विजय भी थी। अहोमों ने अपनी सांस्कृतिक, धार्मिक और प्रशासनिक प्रणाली को बनाए रखा, और उन्होंने अपने स्थानीय शासन को प्रभावी रूप से चलाया। यह उनके अद्वितीय समाज की ताकत थी जिसने उन्हें सदियों तक मुग़ल साम्राज्य के खतरे से बचाए रखा।

अंत में, यह लेख यह सवाल उठाता है कि क्यों अहोम साम्राज्य की वीरता और संघर्ष को मुख्यधारा के इतिहासकारों द्वारा पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया? क्या यह इतिहास के विजेताओं द्वारा तैयार की गई एकतरफा और चयनात्मक प्रस्तुति का परिणाम है? हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि भारतीय इतिहास की पूर्णता केवल उन घटनाओं और व्यक्तित्वों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, जो केवल एक ही दृष्टिकोण से देखी जाती हैं। हमें उन अद्वितीय और साहसी संघर्षों को भी मान्यता देनी चाहिए, जो अक्सर ऐतिहासिक गलियों में छुप जाते हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपनी पूरी सांस्कृतिक धरोहर और संघर्षों को समझ सकें।

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